विशालाक्षी शक्तिपीठ वाराणसी की उन पावन गलियों और घाटों के बीच स्थित है जहाँ पहुँचते ही भक्त को उस आदि शक्ति का अहसास होता है जो पूरे ब्रह्मांड को संचालित करती है।
काशी विश्वनाथ मंदिर के पास और मीर घाट की संकरी गलियों में बसा यह मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है, जहाँ माता सती के कान के कुंडल गिरे थे, जिससे इसका महत्व और भी बढ़ जाता है।
आज के इस विशेष लेख में हम जानेंगे कि माँ विशालाक्षी के दर्शन का सही समय क्या है, मंदिर की पौराणिक कथा क्या है और गंगा के किनारे बसे इस दिव्य स्थान तक पहुँचने का सबसे सुगम मार्ग कौन सा है।
विशालाक्षी शक्तिपीठ वाराणसी: दर्शन का समय और आध्यात्मिक ऊर्जा
प्रभु शिव की नगरी काशी में माँ विशालाक्षी ‘विशाल आँखों वाली देवी’ के रूप में विराजमान हैं, जिनके दर्शन मात्र से भक्तों के जीवन के सारे दुख और अंधेरे दूर हो जाते हैं।
मंदिर के कपाट भक्तों के लिए सुबह 4:30 बजे खुल जाते हैं और रात 10:00 बजे तक दर्शन का क्रम निरंतर चलता रहता है। दोपहर में कुछ समय के लिए माँ को भोग लगाया जाता है।
यहाँ आने का सबसे उत्तम समय ‘नवरात्रि’ का होता है, जब मंदिर को फूलों से सजाया जाता है और पूरी गली माता के भजनों और मंत्रों की गूँज से सराबोर रहती है।
51 शक्तिपीठों की महिमा और मंदिर का गौरवशाली इतिहास
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने माता सती के पार्थिव शरीर को अपने चक्र से काटा था, तब उनके कुंडल इसी स्थान पर गिरे थे, जिसके कारण इसे ‘विशालाक्षी’ (बड़ी आँखों वाली) कहा गया।
इतिहास और वास्तुकला की दृष्टि से देखें तो यह मंदिर दक्षिण भारतीय शैली की झलक पेश करता है। मंदिर की दीवारों पर की गई बारीक़ नक्काशी और गोपुरम भक्तों को तमिलनाडु के मंदिरों की याद दिलाते हैं।
यहाँ माँ की दो प्रतिमाएं हैं—एक बहुत ही प्राचीन आदि विशालाक्षी और दूसरी वर्तमान विग्रह। दोनों के दर्शन करना अत्यंत शुभ माना जाता है और यह भक्तों को एक अनूठी मानसिक शांति प्रदान करता है।
मीर घाट की गलियां और गंगा की शीतल लहरों का अनुभव
विशालाक्षी मंदिर तक पहुँचने का सबसे खूबसूरत रास्ता गंगा के ‘मीर घाट’ से होकर जाता है। घाट की सीढ़ियों से चढ़ते हुए जब आप ऊपर मंदिर की ओर बढ़ते हैं, तो गंगा की शीतल हवा आपका स्वागत करती है।
इन तंग गलियों में चलते हुए आपको बनारस की वह पुरानी खुशबू मिलेगी जहाँ सदियों से साधु-संतों ने तपस्या की है। यहाँ की दीवारों के पत्थर भी जैसे प्राचीन कहानियां सुनाते महसूस होते हैं।
मंदिर के आस-पास की दुकानों पर आपको चुनरी, नारियल और माता का विशेष श्रृंगार का सामान मिलेगा। यहाँ की भीड़ में एक तरह का सन्नाटा और ठहराव है जो आपको अंतरात्मा से जोड़ देता है।
विशेष पूजा और दक्षिण भारतीय परंपरा का संगम
विशालाक्षी मंदिर में दक्षिण भारतीय परंपरा के अनुसार विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। यहाँ भक्त माँ को साड़ी और श्रृंगार का सामान चढ़ाते हैं, जिसे सुहाग और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
शाम की आरती के समय जब दीयों की रोशनी माँ के मुखमंडल पर पड़ती है, तो वह दृश्य इतना अलौकिक होता है कि आपकी आँखें झपकना भूल जाएंगी। उस समय माँ का रूप अत्यंत ममतामयी और भव्य दिखता है।
यहाँ के पुजारी बड़े ही शांत स्वभाव के होते हैं और भक्तों को शक्तिपीठ की महिमा के बारे में विस्तार से बताते हैं। यहाँ बैठकर कुछ देर ‘ललिता सहस्रनाम’ का पाठ करना आपके जीवन में नई ऊर्जा भर देता है।
वाराणसी पहुँचने का मार्ग: ट्रेन और फ्लाइट की सटीक जानकारी
माँ विशालाक्षी के दर्शन के लिए आपका निकटतम पड़ाव वाराणसी जंक्शन (BSB) या बनारस स्टेशन (BSBS) है। ये दोनों स्टेशन भारत के हर प्रमुख शहर से बेहतरीन ट्रेनों के माध्यम से जुड़े हुए हैं।
चूँकि काशी एक प्रमुख धार्मिक केंद्र है, इसलिए ट्रेनों में हमेशा भीड़ रहती है। एक समझदार मार्गदर्शक के रूप में मेरी सलाह है कि आप अपनी टिकट IRCTC Website पर कम से कम 60 दिन पहले बुक करें।
हवाई मार्ग से आने वाले श्रद्धालु लाल बहादुर शास्त्री एयरपोर्ट (VNS) पर उतर सकते हैं। आप [Google Flights] के ज़रिए आसानी से अपनी फ्लाइट बुक कर सकते हैं और वहां से टैक्सी लेकर सीधे घाटों की ओर बढ़ सकते हैं।
स्थानीय परिवहन: स्टेशन से विशालाक्षी मंदिर कैसे पहुँचें?
वाराणसी स्टेशन से मंदिर की दूरी लगभग 5 किलोमीटर है। स्टेशन से बाहर निकलते ही आपको ‘ई-रिक्शा’ मिलेंगे जो आपको सीधे गोदौलिया चौराहे या दशाश्वमेध घाट के पास छोड़ देंगे।
स्टेशन से यहाँ तक का किराया मात्र ₹20 से ₹40 होता है। चूँकि मंदिर घाटों के पास की पतली गलियों में है, इसलिए आपको अंतिम 500-700 मीटर पैदल ही चलना होगा।
मेरा सुझाव है कि आप दशाश्वमेध घाट से नाव (Boat) लेकर मीर घाट तक आएं। गंगा की लहरों पर सैर करते हुए मंदिर पहुँचना आपकी इस यात्रा का सबसे यादगार हिस्सा बन जाएगा।